MAIN MAAYRA

वेलकम नया साल …..2020
इस नए साल कि बात ही कुछ और है ……ठंडी ठंडी हवा चल रही है आकाश में बाद्लो के बीच सूरज चमक रहा हल्का सा धूप बीखेर रहा है , हाथो में चाय का कप , कप में से निकलता धूआ और मै मायरा…. मेरे दिल से निकल रही तरंगे जो इस नए साल के प्यारे से सपने बुन रही थी |
एसे तो हर दिन सूरज निकलता है लेकिन हम कहा देखते है उसकी रोशनी में छुपे रंगों को और मै मायरा अपने सपनों में इन्हीं रंगो को भरने को बेताब थी …
मै मायरा अपने बचपन को याद कर रही थी कितना खेलते थे हम काका , बुआ के बच्चे वो लुका छिप्पि … सायकल चलाना और दूर तक निकल जाना ना कोई चिंता ना आने वाले पल की सोच बस लगे रहते थे हर पल को जी लेने में , मस्ती करने पर मार पड़े या सजा मिलें बस थोड़ा सा रो लेते फिर वहि 7-8 साथियो का झुंड आके हसा देता और हम फिर वहि मस्ती में लग जाते | थोड़ी सी किताबे खोलते और पड लेते और हमेशा दूसरा नम्बर तो आ ही जाता था एसी ही मस्तियो में दोस्तों की महफीलो में वक्त तो हसता खेलता ही गुजरता था ……..
मायरा थी बहुत भावुक और खूबसुरत कोलेज में आते आते तो बहुत से आशिक पिछे पड़ते थे उसके लेकिन मायरा मायरा थी किसी कि बातो में आती नही थी औए उसके दोस्त उसका अपने में से किसी और के बारे में सोचने को मोका भी नही देते थे | ऐसा खिला खिला जीवन था उसका |
एसे करते करते 22 साल की, मम्मी पापा कि लाड्ली मायरा की शादी हो गयी और दुसरे शहर में वो पति के घर आ गयी ससुराल भरा पूरा घर था देवेर, ननद , सास ससुर सभी थे …… लेकिन कुछ ऐसा हुआ कि ससुराल में मायरा जीना भूल गई थी थोड़े शब्दों में कहा जाय तो ना पति से बनी उसकी ना घर के और सद्स्यो से …..
जहा भी कोई ऐसा सुनता सोचता जरुर मायरा में कोई कमी होगी , लेकिन इसके विपरीत मायरा बहुत समझोते करके रही पर सासुराल में सभी का स्वभाव बहुत अलग था गालिया … छोटी सोच , औरतो को घर में ही रहना और अपनी जिंदगी को उन्हि के तरिको से जिने पे मजबूर करना यहि मिला था मायरा को और साथ ही पति के साथ उसे पति की प्रेमिकाये भी मिली थी तोहफे में ………< फिर भी मायरा ने सब सह के जीवन के किमती 20 साल इस तरह गुजारे ख़ुद को बीमार करके .... शारीरिक मानसिक सब तरह से मायरा खोखली हो रही थी .......
लेकिन मायरा तो मायरा थी केसे हार मान लेती एसि ही एक सुबह जब नया सुरज निकला मायरा ने सोचा कि क्या ये सही हे ? क्या यहि सही है कि समाज को , अडोस पडोस के लोगो को , सगे सम्बंधियो को खुश रखने के लिए और इसलिए कि कही उसका नाम ख्रराब ना हो जाए इसलिए या तो जीते जी मर के रहो या सब कुछ खोने के डर से ख़ुद जीना छोड दो ?
मायरा ने अपने आप को फिर से कहा क्या तुम वहि मायरा हो जो एक एसि सोच के साथ जन्मी थी कि आदमी और औरतो को जिने के लिए हवा भी वही चाहिए और सांसे भी वहि चाहिये …. सपने तो आदमी भी देखता हे औरत भी जीने का हक दोनों को ही है और क्यू सिर्फ़ महीलाओ के लिए ये रूल्स है की वो शादी के बाद अपने करियर के लिए , अपने लिए ,अपाने शोक के लिए वक्त नही दे पाती है और उस से भी बडी एक बात ये कि क्यू वो एक दोस्त तक नही रख सकती …..यहा मायरा ये बात स्पशट करती है कि दोस्त जो लड्का हो …..उसे क्यू लोग हमेशा ग़लत मानते है ?

मायरा ने बहुत कोशिश कि लेकिन फिर जब मायरा को लगा कि इस से ज्यादा सहन करने पर ना घर में किसी का फायदा है ना ख़ुद उसका और इस बार मायरा ने जीने के लिए एक कदम उठाया और डिवोर्से लिया | इसमे भी उसे सुनना पडा कि क्या इस उमर में डिवोर्से लेना उचीत है ? उसके बाद अब मायरा ख़ुद कह रही है ……
\”में मायरा अपना जीवन ख़ुद अपने रंगों से भर के जिना चाहती हूँ जहा लगे के सांसे भी चल रही है और हर इक पल में जिने कि खुशबू महक रही है … मायरा मै उसी सूरज कि किरनो कि रोशनी से खिल रही हूँ … आज ख़ुद कमा रही हू .. अपना करियर बाना रही हूँ , जब शादी का रिश्ता नीभ ना सके कई कोशीशो के बाद भी फिर उसे बांधे रखे रहने में किसी का भी हीत नही अब आज मै मायरा जितनी हो सके और एसे बहुत से सपनों को साकार कर रही हू जो अधुरे थे …..और आगे बड्ती जा रही हू …. मै मायरा सभी से कहना चाहती हू कि क्या मुझे हक नही कि में अपने लिए एक साथी ख़ुद तलाश करु इस पडाव पे आके जीवन के ,, क्या मुझे अब भी समाज यही कहेगा ? अरे…. इसका तो चरित्र अच्छा नही ये तो दोस्त भी रखती है | मै मायरा एक सवाल सभी से करती हू कि हम 2020 साल में आ गए है क्या अब भी समाज , रिश्तेदार और लोगो की नजरे मायरा से उसके पवित्र होने का , शराफत का , समझदारी का सबूत मांगेगे ? सवाल के जवाब का ईंतजार रहेगा मायरा को ……..”
-आग जहां रखी जाती है वही जलना आरभ करदेती है ।
” सहो इतना की दिल” धडकना ” भूल ना जाए
झूको इतना की आत्मा ” स्वमान ” भूल ना जाए ”
” जियो एसे कि हर पल तुमको भूला ना सके
जीतो अपनी हार से की जीत भी तुमको भुला ना सके ”
” मै मायरा, मै तो अपना जीवन ख़ुद जिउगी ना मुझे बुरा कहा जाने का डर है ना कोई और चिंता मै तो बस इतना जानती हू कि मुझे मेरे जीवन पर पूरा हक के कि उसे मै केसे जिऊ …मुझे इतना पता है की क्या मेरे लिए सही है क्या ग़लत है , जवाब मुझे मेरे कर्मो को देना है,, मेरे इश्ट देव को देना हे , मेरे जीवन का सही ग़लत का फैसला भी मेरे कर्म करेंगे तो क्यू हक दु में मेरे जीवन पे किसी और को फैसला लेने का |
और यही तो 2020 कि नई सुबह कि नई सोच के साथ जीने की कला है जो हर किसी में होती है बस रंग भर लो जी इसमे …………..

PREETI GUPTAA

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